FLYOVER ke niche basti zindgi (EVERY LIFE has TWO SHEDS)

                        महानगरों में ज़िंदगी के भी कितने अलग -अलग रंग नज़र आते हैं | कोई ऊँची -ऊँची अट्टालिकाओं में रहता है ,तो किसी के घर एक -दो मंजिला होते हैं | कोई बस्ती में रहता है तो किसी के पास घर ही नहीं होता है | यहाँ मैं बात कर रही हूँ “flyover के नीचे बसती ज़िंदगी की “| पूरी की पूरी एक बस्ती ही  बस जाती है इनके नीचे | लोगों की तो बात ही मत पूछों | जिस परिस्थिति में वो जी रहा है ,उसी में ढल जाता है | अगर हमारे पास बड़ा घर है तो जरुरत भी हमारी बड़ी है | अगर हमारे पास कुछ नहीं है तो कोई दिक्कत नहीं है | जहाँ रहो वहीँ अपना आशियाना बना लो | 
                                             
                             
                                    ” ख्वाबों के झुरमुटों में पंख न मिलेंगे                   अग़र उड़ान की चाहत ही न हो 
                     मन मयूरा तो यूँ ही नाचता रहेगा ,                       अग़र दिल में कोई उल्फत ही न हो
                                                                        ऐसा नहीं है कि फुटपाथ पे जो लोग अपना घर बनाये हैं ,उनके पास कुछ नहीं है | अगर सरसरी निगाहों से देखिये तो जरुरत की सारी चीज़ें आपको दिख जाएंगी | लेकिन सोच का करें क्या ?वो तो वहीँ रुकी हुई है | कल की कोई चिंता नहीं | वहीँ जनम लिया ,बड़े हुए और चले गए | 
                                                                           उस माहौल से निकलने की कोई फिक्र नहीं | जरा आप लाल बत्ती पे चले जाइये | गाडी रुकी नहीं कि बच्चे हाथ फैलाना शुरू कर देते हैं | लगता है कि इनके माँ -बाप इसी काम को आगे बढ़ाने के लिए पैदा करते हैं और उन्हें सड़क पे छोड़ देते हैं | जा बेटा जा ! सबके सामने हाथ फैला | लाल बत्ती पे रुक कर तो देखो, जाने कितनी मासूम निगाहें हाथ फैलाती मिलेंगी |  ऐ  जिंदगी तू भी क्या खूब खेल खेलती है किसी को सर पे ख़ुशी की छत मिलती है तो किसी को हाथ फ़ैलाने को मजबूर करती है ‘|
jindgi ki sachhai
जिंदगी की सच्चाई 
                                                     ऐसे माहौल में रहते -रहते बच्चों की मानसिकता भी कुंठित हो जाती है | वे भी इसे अपनी किस्मत मान लेते हैं | कभी -कभी तो इन बच्चों को नशे की लत भी लग  जाती है | 
                                                  दिल्ली में आपको इनका आशियाना फ्लाईओवर के नीचे मिलेगा ,तो मुंबई में ये लोग आपको फुटपाथ पे नजर आयेंगे|  कलकत्ता और मुंबई में तो ऐसे -ऐसे लोगों की बस्ती ही है | 
                                            अब तो धीरे-धीरे इनकी भीड़ हर खाने वाले स्टाल पे भी नजर आने लगी है | कोई खा रहा हो ,तो इनके सामने ये लोग हाथ फैला देते हैं | 

                      
                                                         अफ़सोस तो बहुत होता है ,जब इतनी कड़कती धूप में भी बच्चे सड़क पे दौड़ते रहते हैं | ठंडी हो या बरसात ——-मौसम की मार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है इन पर | जरा ध्यान से देखिएगा तो एक ही बच्चे के कितने सारे भाई -बहन रहते हैं | एक बच्चे की परवरिश अच्छी होती ही नहीं है  कि इनके माँ -बाप दूसरा -तीसरा बच्चा पैदा कर लेते हैं | उन्हें तो बस अपना कुनबा फैलाना होता है | 
                                                      असल में सोच भी इनकी सीमित हो जाती है | सरकार अगर इनके लिए कुछ करती भी है तो अपनी परिस्थिति को ये अपना हथियार बना लेते हैं | इस माहौल से निकलने की कोई जद्दोजहद इनके तरफ से नहीं होती है | 
जिंदगी के अलग -अलग रूप आपको अलग -अलग जगहों पर अलग -अलग रंग लिए नज़र आएंगे |

इनकी कहानी  के उजले पक्ष को तो हमने देख लिया | अब जरा इनकी जिंदगी के अंदरूनी जगह पर भी नज़र डालते हैं |

                                                     शाम ढलने पर एक दुनिया तो सो जाती है ,पर एक दुनिया ऐसी भी होती है ,जो अंधेरों में भी चलती रहती है | बात अगर दिल्ली ,मुंबई जैसे महानगरों की की जाए तो हमेशा से ही यह प्रश्न उठता रहता  है कि आखिर में इनकी रात की जिंदगी किस तरह चलती है 
                                                                     चमकते -दमकते चेहरे ,ऊँचे – ऊँचे भवन ,हंसी -ख़ुशी के रंग रौशनी से नहायी इन महानगरों के एक तरफ का कड़वा सच यह है कि फुटपाथ पे रहने वालों की जिंदगी में १२ घंटे के बाद सूरज तो उगता है पर उनकी जिंदगी में इतने भर से ही सुबह नहीं होती | जाने कितनी सर्द  रातें इन्हे ठिठुरने पर मजबूर करती हैं गर्म हवाओं के झोकें मानों शरीर ही जला देते हैं | बारिश से इनका तिनका -तिनका बिखर जाता है | पर क्या करें ? ये सब चीज़ें इनकी जिंदगी में शामिल हो गयी हैं | 
मुक्कमल जहाँ में सपने तो आँखों में तैरते हैं 
इस बदनसीब जिंदगी का क्या करें ,जो आगे बढ़ने ही न देती हो “
                                                                     फ्लाईओवर के नीचे चले जाईये | आपको जिंदगी को नजदीक से देखने का मौका मिलेगा | जाने कितने परिवार ऐसे हैं ,जो फूल ,गजरा या छोटी -छोटी वस्तुएं बेचकर अपना गुजरा करते हैं | छोटे -छोटे शहरों से आये हुए ये लोग आते तो हैं कमाने ,पर इनकी जिंदगी हमेशा इनसे मशक्कत करवाते रहती है | कुछ लोगों का कहना है कि ये सब लोग ही अपराध को अंजाम देते हैं | पर सबसे बड़ा सच यह  भी है कि जो गरीब है ,वह अपराधी है ,ऐसा हम जैसे लोग भी ये मानने से नहीं चूकते | हमलोगों को यह नहीं दिखता कि कितनी मेहनत करके ये लोग अपने लिए एक वक़्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं | कभी -कभी तो इन लोगों को खाना भी नसीब नहीं हो पाता होगा |
                                                                       अगर आप इन लोगों के पास चले जाइये तो ये अपना गुस्सा आप पर निकाल देंगे | वैसे इनका गुस्सा भी लाजमी है|  इनका  गुस्सा हमारी व्यवस्थाओं ,महंगाई और अपनी दुर्दशा पर होता है | जब अपना काम निकालने का होता है ,तो नेता या बड़े -बड़े लोग इन लोगो के साथ फोटो खिचवाने के लिए चले आते हैं ,पर इन्हे कोई रियायत नहीं मिलती | इनके नाम पर तो लोग खाते  हैं |
                                                    जरा आप लाल बत्ती पर रुक जाइये ,आपको अपनी कार के शीशे पे हाथ लगाते छोटे -छोटे बच्चे मिल जायेंगे | कोई कुछ बेच रहा है तो कोई कुछ मांग रहा है | जिनके हाथों में हमारे देश का भविष्य होना चाहिए ,वे हाथ हमेशा मौसम और दुर्दशा की मार झेलते हुए मांगने के लिए बढ़ते रहते हैं |
                                                    इनकी लडकियां तो और भी सुरक्षित नहीं है| ये रात में इसलिए नहीं सोती है कि कहीं इनके साथ कुछ गलत न हो जाए | ताज्जुब होता है कि जिंदगी ऐसे भी गुजारी जाती है |
                                     ऐसा नहीं है कि ये लोग अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की कोशिश नहीं करते हैं ,पर फुटपाथ जैसे की इनका पीछा ही नहीं छोड़ती | या यूँ बोलिये कि जिंदगी ने इन्हे सही मौके ही नहीं दिए | 
                                             ”   खवाइश इन्हें जीने नहीं देती और ये खवाइश को मरने नहीं देते | कम्बखत जिंदगी भी क्या दास्ताँ लिखती है ,किसी को सोने का महल देती है तो किसी को ठिठुरने पे मजबूर करती है “| 
                         

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