दोस्तों ,           

                  आज मेरा मन कहानी लिखने को कर रहा है ,जो मैं आप सब के सामने प्रस्तुत करना चाहती हूँ इस उम्मीद के साथ कि शायद ये कहानी आप सब को पसंद आए  | 

                                            स्वप्निल आँखें 

                            पार्क में बच्चे पूरे जोश और चिल्लाहट के साथ खेल रहे थे | | तभी एक बच्चे ने गेंद को ऐसे उछाला कि गेंद  सामने के मकान के  शीशे को चकनाचूर करते हुए अंदर चला गया और साथ में विनीता की तन्द्रा को भी तोड़ दिया | सहसा वह अतीत से वर्तमान में वापस आ गयी | वह मकान एक वृद्धआश्रम  था | ये यादें भी उन  शीशों की तरह ही होती हैं ,जब ये जुड़े होते हैं तो बार -बार अपना अक्स उसमे देखने  का मन करता है | जहाँ ये शीशे टूटे ,वहीँ ये पैर  में चुभ जाते हैं बुरी यादों की तरह | 
                                                                        जाने कब से वह खिड़की के पास खड़ी होकर अपनी स्वप्निल दुनिया  में खोयी हुई थी ,जहाँ वह बच्चों की कोलाहल भरी आवाज भी न सुन सकी| सुनती भी कैसे ,यादों की उलझनों ने उसके कान में रुई जो डाल दी थी | 
                                                  उम्र के 70 वें पड़ाव में आकर उसे एहसास हुआ कि जीवन के पतझड़ में खुशियों का वसंत बहुत मुश्किल से आता है | 
                                               
                                                           इतनी छोटी सी थी ,जब उसके माँ -बाप ने अपने कलेजे से निकाल कर अनाथाश्रम में डाल दिया था | वैसे देखा जाये तो अपने जीवन की शुरुआत ही उसने पतझड़ से की थी | कितना मुश्किल रहा होगा न जब वह बच्ची अपनी माँ की आँचल से निकलकर इस बेरहम दुनिया में अकेले जीने की कोशिश की होगी | वैसे माँ -बाप के दिल को भी मानना पड़ेगा ,जब अपने ही अंश को अपने से अलग कर देते हैं | कारण चाहे जो हो ,ये गलत है और गलत ही रहेगा | 
                                                            वो तो विनीता की किस्मत अच्छी थी ,जो मिस्टर एंड मिसेस चौटाला ने गोद ले लिया और उसे अपना नाम दिया | पढ़ाया -लिखाया ,उसे इस काबिल बनाया कि समाज में वह अपनी पहचान बना सके | तभी हवा का एक तेज झोकां आया और उसकी लटें उसके झुर्रीदार चेहरे पे सरसराने लगी और साथ में उसकी तन्द्रा फिर से भंग हो गयी | उसके माथे की सिलवटें एक -एक दर्द बयां  कर रही थीं | अतीत से निकलकर वर्तमान में आना विनीता के मन को झकझोर गया था | 
                                       

                                                             अपने शहर की जानी -मानी प्रिंसिपल विनीता चौटाला से विनीता खन्ना कब बन गयी उसे पता ही नहीं चला | शायद इतनी सारी खुशियां उसके लिए किसी स्वप्न जैसी थी | एक अनाथ बच्ची का अपने जीवन के इस पड़ाव पे पहुंचना वाकई काबिले -तारीफ़ था | इसमें विनीता की लगन और किस्मत दोनों का योगदान रहा | उसके पति रमेश खन्ना भी एक प्रतिष्ठित इंजिनियर थे|  शनै: -शनै: समय सरकता गया और वह दो बच्चों की माँ बन गयी | नाम ,पैसा ,प्रतिष्ठा और एक औरत की सम्पूर्णता सब उसके झोली  में आ गयी थी | 

                                                रवि और सुनील उसकी आँखों के दो तारे थे | अब वह अपना बचपन अपने बच्चों में देखने लगी | उसकी दुनिया रवि और सुनील के इर्द -गिर्द ही थी | उसके पास अपने लिए फुर्सत ही नही होती थी | और ये सच भी है कि जब कोई औरत माँ बनती है तो उसकी दुनिया उसके बच्चे ही होते हैं | ऐसे भी इस दर्द को उससे बेहतर और कोई नहीं समझ  सकता था | विनीता भी अपने आप को भूल गयी थी |  दोनों बच्चे बड़े हो गए थे और उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए |
                                                   बच्चों के जाने के बाद  विनीता का  जीवन फिर से एकाकीमय हो गया  था | उधर उसके माँ -बाप भी चल बसे | रमेश भी पूरे दिन अपने काम में बिजी रहते थे | वैसे तो विनीता खुद एक बड़े ओहदे पे थी ,जिसके पास अपने काम से फुर्सत ही नहीं होती थी | लेकिन वह एक प्रिंसिपल के साथ -साथ एक पत्नी और एक माँ भी थी | एक औरत लाख सफलता की सीढ़ियां चढ़ जाए पर एक माँ और एक पत्नी के अस्तितव को  कभी नहीं भूलती |
                                                     

                                                                                उधर बच्चे पढ़ -लिख कर विदेश में ही settele हो गए थे | यहाँ तक  कि उन्होंने  अपना घर भी बसा लिया था | अपने माँ -बाप को शायद  वे भूल चुके थे या यों कहे कि अपने जीवन और अपने परिवार में इतने मशगूल हो गए कि माँ -बाप की सुध ही ना रही |
                                                     इधर विनीता अपनी सूनी आँखों में इंतज़ार की घड़ियां गिनती रहती थी | ना ख़त्म होने वाला इंतज़ार | ये कैसी विडम्बना है न जिन बच्चों को अपने सीने से लगाकर बड़ा किया ,वे ही उसकी बगिया में सन्नाटा पैदा किये हुए थे | ऐसा नहीं था कि रमेश को अपने बच्चों की परवाह नहीं थी | पर इस दर्द को उन्होंने कभी बिनीता के सामने जाहिर नहीं होने दिया और अपने आप को काम में बिजी कर लिया |
                                                                               retirement के बाद तो सूना घर और खाने को दौड़ने लगा |  | बस दीवारें थी और विनीता थी | रमेश सुबह में में जो निकलते थे ,उनका आना रात को ही हो पाता था |
                                                            बच्चे तो अब आने से रहे | कभी -कभार फ़ोन करके वहीँ से अपने माता -पिता का हाल -चाल ले लिया करते थे | फिर एक दिन ऐसा हुआ ,जिसका किसी को अंदाजा ही नहीं था | रमेश बीच मंझधार में ही अपनी पत्नी को अकेला छोड़कर चल बसे | | विनीता तो जैसे टूट -सी गयी | शायद उसकी किस्मत ही ऐसी थी कि खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक सकती थी |
                                             अब इतने बड़े घर में विनीता नितांत अकेली हो गयी थी | सही कहा गया है -अकेलापन सबसे बड़ी बीमारी है ,जिसकी बस एक ही दवा है -अपनों का साथ |
                                                                             पिता की मौत की खबर ने एकबारगी बेटों को भी विचलित कर दिया था | वे तुरंत भागे -भागे INDIA आ गए | विनीता ने जब बच्चों को देखा तो उसे कुछ ढाढस मिला | उस समय उसकी दशा उस धुप -छावं की तरह हो गयी थी ,जिसमे उसको समझ ही नहीं आ रहा था कि वह धुप की गर्मी महसूस करे या छांव की ठंडी | अपने पति के जाने का गम उसे साल तो रहा था पर साथ -साथ बेटों को भी देखकर उसकी आँखें तर हो गयी थी | जिन बेटों का इंतज़ार वह बरसों से कर रही थी ,उसे ये नहीं पता था कि ऐसी परिस्थिति में अपने बच्चों से मुलाकात करेगी | पिता की मौत ने ही उन्हें यहाँ आने को मजबूर किया था ,वरना उन्हें अपने माता -पिता की चिंता कहाँ थी ?
                                                            तेरहवीं के बाद विनीता ने बेटों से इन जिम्मेदारियों को सम्भालनें को कहा तो दोनों दोनों एक -दूसरे का मुंह देखने लगे | माँ -बाप इतने जतन करके अपने बच्चों को पढ़ाते -लिखाते हैं | उसे इस काबिल बनाते हैं कि समाज में वह अपनी पहचान बना सके | वही बच्चे बड़े होकर अपनी जिम्मेवारियों से मुंह मोड़ लेते हैं | दोनों में से किसी ने अपमी माँ के दर्द को नहीं समझा | उन दोनों का यही मन था कि यहाँ की सारी संपत्ति बेचकर माँ को साथ ले जाते हैं | वे दोनों तो इस हद तक गिर गए की माँ का भी बंटवारा कर लिया | 6 महीना एक बेटे के साथ तो 6 महीना दूसरे बेटे के साथ | ये कैसी विडम्बना है कि एक माँ -बाप  कई बच्चों का लालन -पालन एक साथ कर सकते हैं ,पर वही कई बच्चे मिलकर भी एक माँ -बाप को नहीं पाल सकते |
                                                                अब निर्णय लेने की बारी विनीता की थी | उसने दोनों को तुरंत घर से जाने को कह दिया | इतनी मान -प्रतिष्ठा को विनीता और रमेश ने मिलकर संभाला था ,उसे कैसे बेचती | पर उम्र के इस पड़ाव में जब शरीर भी साथ नहीं देता है तो वह क्या करती | उसने अपनी सारी संपत्ति चैरिटी में दे दी | अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं था | स्वयं को उसने वृद्धाश्रम के हवाले कर दिया | शायद उसकी यही नियति थी | जनम लेने के बाद अनाथाश्रम में पहुंची और जब बुढ़ापा आया और अपनों ने साथ छोड़ दिया तो वृद्धाश्रम में पहुँच गयी | कम -से -कम यहाँ उस जैसी छोड़ी  हुई औरतों के साथ अपना दर्द तो साझा कर ही सकती थी |
                             विनीता का जीवन भी अनाथाश्रम से शुरू होकर वृद्धाश्रम में जाकर खत्म हुआ | यहाँ जाने कितनी औरतें इस इंतज़ार में रहती हैं कि उनके बच्चे आज नहीं तो कल उन्हें लेने जरूर आएंगे | विनीता के लिए तो ये इंतज़ार करना भी नहीं लिखा था | 

                                तभी दीप्ति ने उसे आवाज दी और उसकी तन्द्रा भंग हो गयी और साथ में यादों की पोटली को  भी उसने बाँध लिया | अब यही उसकी सच्चाई थी और उसका भविष्य भी | अतीत की यादों की तपिश उसे हर समय झुलसाती रहती थी | इंसान करे भी तो क्या करे ? अतीत से अपना पीछा तो नहीं छुड़ा सकता |

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