घूंघट में छिपी मुस्कानअधरों में फंसी है सबकी जानवो चंचल चितवनजैसे हिरनी स्वछंद विचरती वन वननैनों की तीक्ष्ण कतारहृदय को भेदे आर पारचरित्र पे ना कोई दागपर उसके दिल में लगी थी आगआखिर कोमलता और भीष्णता का क्या था रहस्य सौम्यता और रुद्रता का मेल था अवश्यसालों पहले की है बातविस्मरण होती नहीं हकीकतगांव की स्वच्छंदता में जी रही थी […]